Thursday, December 12, 2013

दोनों ओर प्रेम पलता है- मैथिलीशरण गुप्त

"दोनों ओर प्रेम पलता है"
दोनों ओर प्रेम पलता है
सखि पतंग भी जलता है हा दीपक भी जलता है 


सीस हिलाकर दीपक कहता
बंधु वृथा ही तू क्यों दहता
पर पतंग पड़कर ही रहता कितनी विह्वलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है 


बचकर हाय पतंग मरे क्या
प्रणय छोड़कर प्राण धरे क्या
जले नही तो मरा करें क्या क्या यह असफलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है 


कहता है पतंग मन मारे
तुम महान मैं लघु पर प्यारे
क्या न मरण भी हाथ हमारे शरण किसे छलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है 


दीपक के जलने में आली
फिर भी है जीवन की लाली
किन्तु पतंग भाग्य लिपि काली किसका वश चलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है 


जगती वणिग्वृत्ति है रखती
उसे चाहती जिससे चखती
काम नही परिणाम निरखती मुझको ही खलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है 


--मैथिलीशरण गुप्त

Wednesday, December 11, 2013

पंचवटी - -मैथिलीशरण गुप्त

पंचवटी

चारु चंद्र की चंचल किरणें,
खेल रहीं थीं जल थल में।
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई थी,
अवनि और अम्बर तल में।

पुलक प्रकट करती थी धरती,
हरित तृणों की नोकों से।
मानो झूम रहे हों तरु भी,
मन्द पवन के झोंकों से।

पंचवटी की छाया में है,
सुन्दर पर्ण कुटीर बना।
जिसके बाहर स्वच्छ शिला पर,
धीर वीर निर्भीक मना।

जाग रहा है कौन धनुर्धर,
जब कि भुवन भर सोता है।
भोगी अनुगामी योगी सा,
बना दृष्टिगत होता है।

बना हुआ है प्रहरी जिसका,
उस कुटिया में क्या धन है।
जिसकी सेवा में रत इसका,
तन है, मन है, जीवन है।

-मैथिलीशरण गुप्त