Monday, May 20, 2019

कुमाऊंनी कविता- सुमित्रानंदन पन्त

सुमित्रानंदन पन्त जी की कुमाऊँनी भाषा में रची गयी एकमात्र कविता-

"सार जंगल में त्वि ज क्वे न्हां रे क्वे न्हां ,
फुलन छै के बुरूंश ! जंगल जस जलि जां ।
सल्ल छ , दयार छ , पई अयांर छ ,
सबनाक फाडन में पुडनक भार छ ,
पै त्वि में दिलैकि आग , त्वि में छ ज्वानिक फाग ,
रगन में नयी ल्वै छ प्यारक खुमार छ ।
सारि दुनि में मेरी सू ज , लै क्वे न्हां ,
मेरि सू कैं रे त्योर फूल जै अत्ती माँ ।
काफल कुसुम्यारु छ , आरु छ , आँखोड़ छ ,
हिसालु , किलमोड़ त पिहल सुनुक तोड़ छ ,
पै त्वि में जीवन छ , मस्ती छ , पागलपन छ ,
फूलि बुंरुश ! त्योर जंगल में को जोड़ छ ?
सार जंगल में त्वि ज क्वे न्हां रे क्वे न्हां ,
मेरि सू कैं रे त्योर फुलनक म' सुंहा ॥"

Saturday, May 11, 2019

नज़दीकियों में दूर का मंज़र तलाश कर- निदा फ़ाज़ली

नज़दीकियों में दूर का मंज़र तलाश कर
जो हाथ में नहीं है वो पत्थर तलाश कर

सूरज के इर्द-गिर्द भटकने से फ़ाएदा
दरिया हुआ है गुम तो समुंदर तलाश कर

तारीख़ में महल भी है हाकिम भी तख़्त भी
गुमनाम जो हुए हैं वो लश्कर तलाश कर

रहता नहीं है कुछ भी यहाँ एक सा सदा
दरवाज़ा घर का खोल के फिर घर तलाश कर

कोशिश भी कर उमीद भी रख रास्ता भी चुन
फिर इस के बा'द थोड़ा मुक़द्दर तलाश कर

-निदा फ़ाज़ली

Monday, May 6, 2019

हज़ार राहें, मुड़के देखीं- गुलज़ार

हज़ार राहें, मुड़के देखीं
कहीं से कोई सदा न आई

बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई

जहाँ से तुम मोड़ मुड़ गये थे
जहाँ से तुम मोड़ मुड़ गये थे
वो मोड़ अब भी वही खड़े हैं

हम अपने पैरों में जाने कितने
हम अपने पैरों में जाने कितने
भंवर लपेटे हुए खड़े हैं
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई

कहीं किसी रोज़ यूं भी होता
कहीं किसी रोज़ यूं भी होता
हमारी हालत तुम्हारी होती

जो रातें हमने गुज़ारी मरके
जो रातें हमने गुज़ारी मरके
वो रात तुमने गुज़ारी होतीं
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई

तुम्हें ये ज़िद थी के हम बुलाते
हमें ये उम्मीद वो पुकारें

है नाम होंठों पे अब भी लेकिन
आवाज़ में पड़ गई दरारें

हज़ार राहें, मुड़के देखीं
कहीं से कोई सदा ना आई

बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई

- गुलज़ार