भारत के अंबर पर देखो |
Friday, January 10, 2020
हिंदी चमक रही है- नीरज कुमार नीर
Thursday, January 9, 2020
हिंदी को नमन- ओम प्रकाश नौटियाल
अंकित अक्षित संस्कार हो |
राष्ट्रभाषा- वीरेंद्र मिश्र
धरती-जाई भाषा अपनी, जननी, अपनी बोली
हिंदी यही, जय हिंद यही है
प्रेम-पुजारिन हिंदी
इसके एक नयन में गंगा
दूजे में कालिंदी
अंतर्धारा के संगम पर, इसने मिसरी घोली
धरती-जाई भाषा अपनी, जननी, अपनी बोली।
तुलसी, मीरा ज्योति नयन की
दास कबीरा ज्वाला
जिसको गुन लेता सूरा भी
उसका ठाठ निराला
देवी के मंदिर द्वारे पर रचना है रंगोली
धरती-जाई भाषा अपनी, जननी, अपनी बोली।
इसका स्वाद प्रसाद बहुत है
जनभाषा रसवंती
ऋतुओं में वासंती है यह
रागों में मधुवंती
भाषाएँ हों चाहे जितनी, यह सबकी हमजोली
धरती-जाई भाषा अपनी, जननी, अपनी बोली।
हिंसा से जलती दुनिया में
हिंदी अमृत-वाणी
तोड़ेगी क्यों, जोड़ेगी यह
सबकी रामकहानी
मिट्टी में मिल जाएँ न सपने, यह है उनकी झोली
धरती-जाई भाषा अपनी, जननी, अपनी बोली।
- वीरेंद्र मिश्र
Monday, January 6, 2020
हथेली पर रखी है क्यों निगाहों में नहीं आती -डॉ० विनय मिश्र
ये कैसी जिंदगी है जो खयालों में नहीं आती
किनारों में भी रहकर जो किनारों तक नहीं आती
तेरी साज़िश समय पर जो उजालों में नहीं आती
खुदा का शुक्र है दुनियां छलावों में नहीं आती
उधर बेचैनियाँ हैं नीद रातों में नहीं आती
मगर हालत सवालों की जवाबों में नहीं आती
हकीकत लाख कोशिश पर भी बातों में नहीं आती
-डॉ० विनय मिश्र
वसीम बरेलवी
यह रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते।
ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना,
बुरे ज़माने कभी पूछ कर नहीं आते।
-वसीम बरेलवी