Thursday, July 25, 2019

कारगिल की विजय यात्रा- पारिजात भारद्वाज

क्षण बड़ा गंभीर था,
लहू-लुहान शरीर था। 
शत्रु से अनजान था,
वो समय बड़ा बलवान था।।

जब धूर्तों ने अपनी चाल चली,
और सारे हदों को पार करी।
कायरों ने अपना भेष बदल,
ले ओट छुपा हमारे घर।।

फिर मिला ‘कालिया’ क्षत-विक्षत,
पहाड़ी पर खून से लथपथ ।
अरि के आँखों में आँखें डाल,
उसने की थी माँ भारती की जयकार।।

अब आरम्भ हो चुका था रण,
और दहलने लगा था शत्रु का मन।
जब गरजा आसमान से ‘नचिकेता’,
तब दुश्मन का हौसला टूटा ।।

बर्फ़ीली पहाड़ियों पर ‘विक्रम’,
दिखा रहा था अपना पराक्रम।
एक-एक असुरों को खोज,
वध कर रहा था ‘मनोज’।।

दुर्गा माता की जयकार,
कर बढ़ रहा था ‘संजय कुमार’।
और जबतक ना हुई साँसें अंत,
तबतक लड़ा वीर ‘विजयंत’।।

द्रास, मश्कोह, तोलोलिंग, टाइगर हिल,
सब पर तिरंगा लहरा रहा था।
विजय पाकर पूरा भारतवर्ष,
फूले नहीं समा रहा था।।

शत्रु भी बड़ा विचित्र था,
स्वार्थी और चरित्रहीन था।
अपने सिपाही के शवों को अस्वीकारा,
बुज़दिल और विवेकविहीन था।।

हमने पूरा सम्मान किया,
सैनिकों सा मान दिया।
यही है अपना संस्कार,
शत्रु से भी उचित व्यवहार।।

सालों बीत चुके हैं अब,
पर याद है हमें वो कुर्बानी।
वीर सपूतों ने त्यागा जब,
मातृभूमि के लिये जवानी।।

- पारिजात भारद्वाज

Monday, July 22, 2019

बचपन पहाड़ का- कविता भट्ट

ए.सी.में बैठ बनती हैं अधिकार-नीतियाँ 
चर्चाएँ करती रहती हैं- बड़ी-बड़ी विभूतियाँ ।
बारिश-धूप में पलता है- बचपन पहाड़ का 
पढ़ने को कोसों चलता है- बचपन पहाड़ का ।

शहरों में बोझे बस्तों के ही लगते हैं मुश्किल 
यहाँ घास-पानी-गोबर भी है- बोझे में शामिल ।
पहाड़ी बर्फ़-सा गलता है- बचपन पहाड़ का
होटलों में बर्तन मलता है- बचपन पहाड़ का ।

इनको जरा निहारो तुम ओ बाबूजी ! करीब से 
आँखें मिलाओ ,तो जरा किसी बच्चे गरीब से ।
गिरता है और सँभलता है- बचपन पहाड़ का 
बस ठोकरों में ही पलता है- बचपन पहाड़ का। 
  
सरकारें जपती रहती हैं- नित माला विकास की 
कोई तो सुध ले पहाड़ी से इस ढलती आस की ।
पहाड़ी सूरज- सा उग-ढलता है बचपन पहाड़ का 
पगडंडियों में गुम मिलता है- बचपन पहाड़ का ।

Saturday, July 6, 2019

न होने की गंध - केदारनाथ सिंह

अब कुछ नहीं था
सिर्फ हम लौट रहे थे
इतने सारे लोग सिर झुकाए हुए
चुपचाप लौट रहे थे
उसे नदी को सौंपकर

और नदी अँधेरे में भी
लग रही थी पहले से ज्यादा उदार और अपरंपार
उसके लिए बहना उतना ही सरल था
उतना ही साँवला और परेशान था उसका पानी
और अब हम लौट रहे थे
क्योंकि अब हम खाली थे
सबसे अधिक खाली थे हमारे कंधे
क्योंकि अब हमने नदी का
कर्ज उतार दिया था
न जाने किसके हाथ में एक लालटेन थी
धुँधली-सी
जो चल रही थी आगे-आगे
यों हमें दिख गई बस्ती
यों हम दाखिल हुए फिर से बस्ती में

हमारे आने पर भूँका नहीं
एक भी कुत्ता
क्योंकि कुत्तों को सब मालूम था
उस घर के किवाड़
अब भी खुले थे
कुछ नहीं था सिर्फ रस्म के मुताबिक
चौखट के पास धीमे-धीमे जल रही थी
थोड़ी-सी आग
और उससे कुछ हटकर
रखा था लोहा
हम बारी-बारी
आग के पास गए और लोहे के पास गए
हमने बारी-बारी झुककर
दोनों को छुआ

यों हम हो गए शुद्ध
यों हम लौट आए
जीवितों की लंबी उदास बिरादरी में
कुछ नहीं था
सिर्फ कच्ची दीवारों
और भीगी खपरैलों से
किसी एक के न होने की
गंध आ रही थी

- केदारनाथ सिंह