क्षण बड़ा गंभीर था,
लहू-लुहान शरीर था।
शत्रु से अनजान था,
वो समय बड़ा बलवान था।।
जब धूर्तों ने अपनी चाल चली,
और सारे हदों को पार करी।
कायरों ने अपना भेष बदल,
ले ओट छुपा हमारे घर।।
फिर मिला ‘कालिया’ क्षत-विक्षत,
पहाड़ी पर खून से लथपथ ।
अरि के आँखों में आँखें डाल,
उसने की थी माँ भारती की जयकार।।
अब आरम्भ हो चुका था रण,
और दहलने लगा था शत्रु का मन।
जब गरजा आसमान से ‘नचिकेता’,
तब दुश्मन का हौसला टूटा ।।
बर्फ़ीली पहाड़ियों पर ‘विक्रम’,
दिखा रहा था अपना पराक्रम।
एक-एक असुरों को खोज,
वध कर रहा था ‘मनोज’।।
दुर्गा माता की जयकार,
कर बढ़ रहा था ‘संजय कुमार’।
और जबतक ना हुई साँसें अंत,
तबतक लड़ा वीर ‘विजयंत’।।
द्रास, मश्कोह, तोलोलिंग, टाइगर हिल,
सब पर तिरंगा लहरा रहा था।
विजय पाकर पूरा भारतवर्ष,
फूले नहीं समा रहा था।।
शत्रु भी बड़ा विचित्र था,
स्वार्थी और चरित्रहीन था।
अपने सिपाही के शवों को अस्वीकारा,
बुज़दिल और विवेकविहीन था।।
हमने पूरा सम्मान किया,
सैनिकों सा मान दिया।
यही है अपना संस्कार,
शत्रु से भी उचित व्यवहार।।
सालों बीत चुके हैं अब,
पर याद है हमें वो कुर्बानी।
वीर सपूतों ने त्यागा जब,
मातृभूमि के लिये जवानी।।
- पारिजात भारद्वाज