Saturday, March 7, 2020

कौन रंग फागुन रंगे- दिनेश शुक्ल

कौन रंग फागुन रंगे, रंगता कौन वसंत,
प्रेम रंग फागुन रंगे, प्रीत कुसुंभ वसंत।

रोमरोम केसर घुली, चंदन महके अंग,
कब जाने कब धो गया, फागुन सारे रंग।

रचा महोत्सव पीत का, फागुन खेले फाग,
साँसों में कस्तूरियाँ, बोये मीठी आग।

पलट पलट मौसम तके, भौचक निरखे धूप,
रह रहकर चितवे हवा, ये फागुन के रूप।

मन टेसू टेसू हुआ तन ये हुआ गुलाल
अंखियों, अंखियों बो गया, फागुन कई सवाल।

होठोंहोठों चुप्पियाँ, आँखों, आँखों बात,
गुलमोहर के ख्वाब में, सड़क हँसी कल रात।

अनायास टूटे सभी, संयम के प्रतिबन्ध,
फागुन लिखे कपोल पर, रस से भीदे छंद।

अंखियों से जादू करे, नजरों मारे मूंठ,
गुदना गोदे प्रीत के, बोले सौ सौ झूठ।

पारा, पारस, पद्मिनी, पानी, पीर, पलाश,
प्रंय, प्रकर, पीताभ के, अपने हैं इतिहास।

भूली, बिसरी याद के, कच्चेपक्के रंग,
देर तलक गाते रहे, कुछ फागुन के संग।

- दिनेश शुक्ल

चांदनी चुपचाप सारी रात- अज्ञेय

चांदनी चुपचाप सारी रात-
सूने आँगन में
जाल रचती रही 

मेरी रूपहीन अभिलाषा
अधूरेपन की मद्धिम-
आंच पर तचती रही 

व्यथा मेरी अनकही
आनन्द की सम्भावना के
मनश्चित्रों से परचती रही 

मैं दम साधे रहा
मन में अलक्षित
आंधी मचती रही 

प्रात: बस इतना कि मेरी बात
सारी रात
उघड़ कर वासना का
रूप लेने से बचती रही