Tuesday, December 31, 2019

मैं दृष्टा हूँ- रवि सिंघल


देखता हूँ गगन, सुमन और समुंदर की तरुणाई को,
प्रति पल धीमी होती हुई इस समय की अरुणाई को।
दु:ख के रक्त कणोंसे लतपथ जीवन के अवसाद को,
या सुख के प्यालों से छके हुए मन के अंतर्नाद को।

शीत उष्ण और वर्षा पतझड़ ऋतुएं आती जाती हैं,
इस शरीर और मन के द्वारों पर दस्तक दे जाती हैं।
मिलना और बिछोह हृदय के तारो को सहलाता है,
इस जीवन का मायाजाल शरीर को बांधे जाता है।

पर मैं लिप्त नहीं, मैं भुक्त नहीं,
अतृप्त नहीं, आसक्त नहीं।
ये समग्र विलास है जग मेरा,
पर मैं करण नहीं मैं संज्ञा नहीं।

मैं तो केवल दृष्टा हूँ,
बिन आँखों के, बिन साँसों के।
देख रहा हूँ हो विस्मित,
जिस सृष्टि का मैं सृष्टा हूँ।

- रवि सिंघल

अभी होने दो समय को- कुमार रवीन्द्र

अभी होने दो 
समय को 
गीत फिर कुछ और

वक्त के बूढ़े कैलेंडर को 
हटा दो 
नया टाँगों
वर्ष की पहली सुबह से 
बाँसुरी की धुनें माँगो

सुनो निश्चित 
आम्रवन में 
आएगा फिर बौर

बर्फ की घटनाएँ 
थोड़ी देर की हैं 
धूप होंगी 
खुशबुओं के टापुओं पर 
टिकेगी फिर परी-डोंगी

साँस की 
यात्राओं को दो
वेणुवन की ठौर

अभी बाकी 
है अलौकिकता 
हमारे शंख में भी 
और बाकी हैं उड़ानें 
सुनो, बूढ़े पंख में भी

इन थकी 
पिछली लयों पर भी 
करो तुम गौर

- कुमार रवीन्द्र 

Tuesday, December 24, 2019

सूखती रजनीगन्धा- अटल बिहारी वाजपेयी

कहु सजनी ! रजनी कहाँ ?
अँधियारे में चूर;
एक बरस में ढर गया,
चेहरे पर से नूर;
चेहरे पर से नूर;
दूर दिल्ली दिखती है;
नियति निगोड़ी कभी
कथा उलटी लिखती है;
कह कैदी कविराय,
सूखती रजनीगन्धा;
राजनीति का पड़ता है,
जब उलटा फन्दा। 

 - - अटल बिहारी वाजपेयी 

बेचैनी की रात- अटल बिहारी वाजपेयी

बेचैनी की रात,
प्रात भी नहीं सुहाता;
घिरी घटा घनघोर,
न कोई पंछी गाता;
तन भारी, मन खिन्न,
जागता दर्द पुराना;
सब अपने में मस्त,
पराया कष्ट न जाना;
कह कैदी कविराय,
बुरे दिन आने वाले;
रह लेंगे जैसा,
रखेगा ऊपर वाले!

---अटल बिहारी वाजपेयी 

Merry Christmas

Saturday, December 21, 2019

गुरु महिमा- डॉ०ऋचा त्रिपाठी

गुरु में समाहित सभी प्रकाश पुंज,
गुरु के आलोक से आलोकित धरा।
समस्त लोकों की शुभता होती गुरु से,
गुरु से ही सब कुछ, ये सम्बन्ध प्यारा।
गुरु से ले शिक्षा ,पायी जग में सफलता,
गुरु ही मुक्तिपथ का उद्घाटन भी करता।
माता ही प्रथम गुरु ये सबने है माना,
उससे ही शिक्षा पाई, सबको है जाना।
हर एक ज्ञान हेतु गुरु पर ही आश्रित,
उसकी ही कृपा से नहीं हम पराश्रित।
शिक्षा देकर जगत में उन्नति कराता,
दीक्षा देकर हमारे विकारों को हरता।
अबोध से स्वबोध तक उसकी कृपा है,
आत्मानुभूति से आनन्दअनुभूति तक दया है।
गुरु के ही कारण अस्तित्व अपना,
उसी से प्रकाशित ये जीवन हमारा।
अवतारों ने भी गुरु शक्ति को माना,
अत: राम व कृष्ण ने गुरु आज्ञा को माना।
गुरु के ही कारण हम गुण का खजाना,
गुरु पे न्योछावर अब ये जीवन हमारा।


- डॉ०ऋचा त्रिपाठी (बैंगलोर कर्नाटक) 

Thursday, December 19, 2019

गीत कोई कसमसाता -अनिता निहलानी


गीत कोई कसमसाता
नील नभ के पार कोई
मंद स्वर में गुनगुनाता,
रूह की गहराइयों में
गीत कोई कसमसाता!

निर्झरों सा कब बहेगा
संग ख़ुशबू के उड़ेगा,
जंगलों का मौन नीरव
बारिशों की धुन भरेगा!

करवटें ले शब्द जागे
आहटें सुन निकल भागे,
हार आखर का बना जो
बुने किसने राग तागे!

गूँजता है हर दिशा में
भोर निर्मल शुभ निशा में,
टेर देती धेनुओं में
झूमती पछुआ हवा में!

लौटते घर हंस गाते
धार दरिया के सुनाते,
पवन की सरगोशियाँ सुन
पात पादप सरसराते!

गीत है अमरावती का
घाघरा ' ताप्ती का,
कंठ कोकिल में छुपा है
प्रीत की इक रागिनी का!

---अनिता निहलानी

Wednesday, December 18, 2019

आह्वान- अशफ़ाकउल्ला ख़ां

कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखाएंगे,
आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे।

हटने के नहीं पीछे, डरकर कभी जुल्मों से,
तुम हाथ उठाओगे, हम पैर बढ़ा देंगे।

बेशस्त्र नहीं हैं हम, बल है हमें चरख़े का,
चरख़े से ज़मीं को हम, ता चर्ख़ गुंजा देंगे।

परवा नहीं कुछ दम की, ग़म की नहीं, मातम की,
है जान हथेली पर, एक दम में गंवा देंगे।

उफ़ तक भी जुबां से हम हरगिज़ न निकालेंगे,
तलवार उठाओ तुम, हम सर को झुका देंगे।

सीखा है नया हमने लड़ने का यह तरीका,
चलवाओ गन मशीनें, हम सीना अड़ा देंगे।

दिलवाओ हमें फांसी, ऐलान से कहते हैं,
ख़ूं से ही हम शहीदों के, फ़ौज बना देंगे।

मुसाफ़िर जो अंडमान के, तूने बनाए, ज़ालिम,
आज़ाद ही होने पर, हम उनको बुला लेंगे।

--- अशफ़ाकउल्ला ख़ां

जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा- राजेंद्र कृष्ण


सरफ़रोशी की तमन्ना- बिस्मिल अज़ीमाबादी

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है

ऐ वतन, करता नहीं क्यूँ दूसरी कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है
ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा ग़ैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वक़्त आने पर बता देंगे तुझे, ए आसमान,
हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है
खेँच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उमीद,
आशिकों का आज जमघट कूचा-ए-क़ातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

है लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर,
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर.
ख़ून से खेलेंगे होली अगर वतन मुश्क़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ, जिन में है जूनून, कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से.
और भड़केगा जो शोला सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से ही थे निकले बाँधकर सर पर कफ़न,
जाँ हथेली पर लिए लो बढ चले हैं ये कदम.
ज़िंदगी तो अपनी मॆहमाँ मौत की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

यूँ खड़ा मक़्तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है?
दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज.
दूर रह पाए जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमे न हो ख़ून-ए-जुनून
क्या लड़े तूफ़ान से जो कश्ती-ए-साहिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल मे!

-बिस्मिल अज़ीमाबादी

Tuesday, December 17, 2019

उदास तुम- धर्मवीर भारती

तुम कितनी सुन्दर लगती हो
जब तुम हो जाती हो उदास!
ज्यों किसी गुलाबी दुनिया में सूने खँडहर के आसपास
मदभरी चांदनी जगती हो!

मुँह पर ढँक लेती हो आँचल
ज्यों डूब रहे रवि पर बादल,
या दिन-भर उड़कर थकी किरन,
सो जाती हो पाँखें समेट, आँचल में अलस उदासी बन!
दो भूले-भटके सान्ध्य-विहग, पुतली में कर लेते निवास!
तुम कितनी सुन्दर लगती हो
जब तुम हो जाती हो उदास!

खारे आँसू से धुले गाल
रूखे हलके अधखुले बाल,
बालों में अजब सुनहरापन,
झरती ज्यों रेशम की किरनें, संझा की बदरी से छन-छन!
मिसरी के होठों पर सूखी किन अरमानों की विकल प्यास!
तुम कितनी सुन्दर लगती हो
जब तुम हो जाती हो उदास!

भँवरों की पाँतें उतर-उतर
कानों में झुककर गुनगुनकर
हैं पूछ रहीं-‘क्या बात सखी?
उन्मन पलकों की कोरों में क्यों दबी ढँकी बरसात सखी?
चम्पई वक्ष को छूकर क्यों उड़ जाती केसर की उसाँस?
तुम कितनी सुन्दर लगती हो
ज्यों किसी गुलाबी दुनिया में सूने खँडहर के आसपास
मदभरी चाँदनी जगती हो!

-धर्मवीर भारती

तुम्हारे साथ रहकर - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना


तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है
कि दिशाएँ पास आ गयी हैं,
हर रास्ता छोटा हो गया है,
दुनिया सिमटकर
एक आँगन-सी बन गयी है
जो खचाखच भरा है,
कहीं भी एकान्त नहीं
न बाहर, न भीतर।

हर चीज़ का आकार घट गया है,
पेड़ इतने छोटे हो गये हैं
कि मैं उनके शीश पर हाथ रख
आशीष दे सकता हूँ,
आकाश छाती से टकराता है,
मैं जब चाहूँ बादलों में मुँह छिपा सकता हूँ।
तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे महसूस हुआ है
कि हर बात का एक मतलब होता है,
यहाँ तक की घास के हिलने का भी,
हवा का खिड़की से आने का,
और धूप का दीवार पर
चढ़कर चले जाने का।
तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
सम्भावनाओं से घिरे हैं,
हर दिवार में द्वार बन सकता है
और हर द्वार से पूरा का पूरा
पहाड़ गुज़र सकता है।
शक्ति अगर सीमित है
तो हर चीज़ अशक्त भी है,
भुजाएँ अगर छोटी हैं,
तो सागर भी सिमटा हुआ है,
सामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है,
जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है
वह नियति की नहीं मेरी है।

- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

अमलतास - गुलज़ार


खिड़की पिछवाड़े को खुलती तो नज़र आता था,
वो अमलतास का इक पेड़, ज़रा दूर, अकेला-सा खड़ा था,
शाखें पंखों की तरह खोले हुए.
एक परिन्दे की तरह,
बरगलाते थे उसे रोज़ परिन्दे आकर,
सब सुनाते थे वि परवाज़ के क़िस्से उसको,
और दिखाते थे उसे उड़ के, क़लाबाज़ियाँ खा के,
बदलियाँ छू के बताते थे, मज़े ठंडी हवा के!
आंधी का हाथ पकड़ कर शायद.
उसने कल उड़ने की कोशिश की थी,
औंधे मुँह बीच-सड़क आके गिरा है!!

-गुलज़ार

Sunday, December 15, 2019

चारों ओर अंधेरा- राजकमल चौधरी

चारों ओर अंधेरा
नदी तट पर, मुर्दघट्टी, खेत-खलिहान, जंगल-झाड़ में
रो रहे हैं एक साथ
अन्धे मनुष्य और कुत्ते, बाघ, सियार!
मैं ही अकेला ढूंढ़ रहा हूँ
अनन्त में शब्द। शब्द में अर्थ। अर्थ में जीवन
जीवन में अकेला मैं ही
धूल-गर्द-कंकड़-पत्थर फांक रहा हूं।
क्या बौड़म है पूरा समाज?
गांव छोड़कर, खेत बेचकर, रखकर बन्धक गहने-जेवर
खान, फैक्टरी, कल-कारखाने की तरफ भाग रहा है।
गांव घर का, घर-डीह का नहीं रहा काम?
सत्य बोलिए आप हैं कहां?
पोथी-पतरा, ज्ञान-ध्यान, जप, तंत्रा-मंत्रा सब हारे-
दो आखर की पुष्पांजलि, यह प्रेम
कर सकेगा स्पर्श क्या आपका हृदय?
चारों ओर अंधेरा
गांव-नगर में, पथ-प्रान्तर में, वन में भटकने से लाभ?
जीवन समस्त, पृथ्वी समस्त है अन्ध-कूप
कूप में चमक रहा है विषधर मनियार!

- राजकमल चौधरी

मुक्ति की आकांक्षा: सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

चिडि़या को लाख समझाओ
कि पिंजड़े के बाहर
धरती बहुत बड़ी है, निर्मम है,
वहाँ हवा में उन्हें
अपने जिस्म की गंध तक नहीं मिलेगी।
यूँ तो बाहर समुद्र है, नदी है, झरना है,
पर पानी के लिए भटकना है,
यहाँ कटोरी में भरा जल गटकना है।
बाहर दाने का टोटा है,
यहाँ चुग्गा मोटा है।
बाहर बहेलिए का डर है,
यहाँ निर्द्वंद्व कंठ-स्वर है।
फिर भी चिडि़या
मुक्ति का गाना गाएगी,
मारे जाने की आशंका से भरे होने पर भी,
पिंजरे में जितना अंग निकल सकेगा, निकालेगी,
हरसूँ ज़ोर लगाएगी
और पिंजड़ा टूट जाने या खुल जाने पर उड़ जाएगी।

- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

Wednesday, December 11, 2019

एक क़र्ज़ मांगता हूँ बचपन उधार दे दो - कवि प्रदीप

किस बाग़ में मैं जन्मा खेला 
मेरा रोम रोम ये जानता है 
तुम भूल गए शायद माली 
पर फूल तुम्हे पहचानता है 
जो दिया था तुमने एक दिन 
मुझे फिर वो प्यार दे दो 
एक क़र्ज़ मांगता हूँ बचपन उधार दे दो 

तुम छोड़ गए थे जिसको 
एक धूल भरे रस्ते में 
वो फूल आज रोता है 
एक अमीर के गुलदस्ते में 
मेरा दिल तड़प रहा है मुझे फिर दुलार दे दो 
एक क़र्ज़ मांगता हूँ बचपन उधार दे दो...

मेरी उदास आँखों को है याद वो वक़्त सलोना 
जब झूला था बांहों में मैं बन के तुम्हारा खिलौना 
मेरी वो ख़ुशी की दुनिया फिर एक बार दे दो 
एक क़र्ज़ मांगता हूँ बचपन उधार दे दो...

तुम्हे देख उठते हैं 
मेरे पिछले दिन वो सुनहरे 
और दूर कहीं दिखते हैं
मुझसे बिछड़े दो चेहरे 
जिसे सुनके घर वो लौटे मुझे वो पुकार दे दो 
एक क़र्ज़ मांगता हूँ बचपन उधार दे दो...

- कवि प्रदीप 

Saturday, December 7, 2019

मधुमय स्वप्न रंगीले- बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'

बन-बनकर मिट गए अनेकों मेरे मधुमय स्वप्न रंगीले

भर-भरकर फिर-फिर सूखे हैं मेरे लोचन गीले-गीले।

मेरा क्या कौशल, क्या मेरी चंचल तूली, क्या मेरे रंग
क्या मेरी कल्पना हंसिनी, मेरी क्या रस रासरति उमंग
मैं कब का रंग-रूप चितेरा, मैं कब विचर सका खग-कुल संग
मन-स्वप्नों के चित्र स्वयं ही बने स्वयं ही मिटे हठीले
भर-भरकर फिर-फिर सूखे हैं ये मेरे रंग-पात्र रंगीले।

कलाकार कब का मैं प्रियतम, कब मैंने तूलिका चलाई
मैंने कब यत्नत: कला के मंदिर में वर्तिका जलाई
यों ही कभी काँप उठ्ठी है मेरी अंगुली और कलाई
यों ही कभी हुए हैं कुछ-कुछ रसमय कुछ पाहन अरसीले!
बन-बनकर मिट गए अनेकों मेरे मधुमय स्वप्न रंगीले!

मैंने कब सजीवता फूँकी जग के कठिन शैल पाहन में
मैं कर पाया प्राणस्फुरण कब अपने अभिव्यंजन वाहन में
मुझे कब मिले सुंदर मुक्ता भावार्णव के अवगाहन में
यदा-कदा है मिले मुझे तो तुम जैसे कुछ अतिथि लजीले!
यों ही बन-बनकर बिगड़े हैं मेरे मधुमय स्वप्न रंगीले।

मेरे स्वप्न विलीन हुए हैं किंतु शेष है परछाई-सी
मिटने को तो मिटे किंतु वे छोड़ गए हैं इक झाईं-सी
उस झिलमिल की स्मृति-रेखा से हैं वे आँखे अकुलाई-सी
उसी रेख से बन उठते हैं फिर-फिर नवल चित्र चमकीले
बन-बनकर मिट गए अनेकों मेरे सपने गीले-गीले!


-बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'