Tuesday, February 12, 2019

पहन के झूटी हँसी महफ़िलों में जाना क्या?

पहन के झूटी हँसी महफ़िलों में जाना क्या
उदास हैं तो उदासी में मुस्कुराना क्या

तमाशे ज़हन के आसूदगी पे निर्भर हैं
लगी हो नींद तो तारों का झिलमिलाना क्या

गले लगाने से पहले ये काम करना था
बना लिया उसे अपना तो आज़माना क्या

शराब छोड़ दी सिगरेट भी तोड़ दी हमने
तुम्हारे वास्ते अब छोड़ दें ज़माना क्या

वो चाहे आंसू का क़तरा हो या कोई चेहरा
जो गिर गया गया है पलक से उसे उठाना क्या

शराब पी है तो सो जाते हैं सुकून की नींद
अब उससे मिल के नशे में नशा मिलाना क्या

किनारे वाले तो मिलते-बिछड़ते रहते हैं
अब इनके वास्ते दरिया पे पुल बनाना क्या

ग़ज़ल तरह में भी कहिये तो अपनी तरह के साथ
किसी के मिसरे पे साहब गिरह लगाना क्या

- शकील आज़मी