Saturday, February 8, 2020

पहला प्रेम- सोनी पांडेय


जब तुम पहली बार मिले
मौसम कुछ गुलाबी हुआ था
तभी से गाँठे लिए फिरती हूँ
दुपट्टे के कोर में गुलाबी रंग...

मेरे दुपट्टे के कोर से निकल कर
छिटकता है चाँदनी के चँदावे में
गुलाबी रंग
प्रेम इस तरह गुलाबी होता है

हर चाहने वालों के लिए प्रेम
चाँदनी रातों में...

मेरे दुपट्टे से निकलकर
फैलता है गुलाबी रंग
जब जागता है सूरज
हर चाहने वाले के मन में
मिसरी सा घुल जाता है
गुलाबी रंग
इस तरह प्रेम जवान होता है
जब सूरज थोड़ा सुनहरा होता है...

जाते-जाते बसंत
तुम रंग गए
प्रेम के गुलाबी रंग में
मेरी डायरी के पीले पड़े पन्नों में
बचा है
सन्दूक के नीचले कपड़ों में दबा
मह-मह महकता
महुए के गंध में घुला
प्रेम का गुलाबी रंग...

तुम भूल गए
जाते बसंत के साथ
इस लिए जब लौटना
हमारी गली में
महसूसना
हवाओं में तैरता मिलेगा
मेरे प्रेम का गुलाबी रंग...

Friday, February 7, 2020

दया- अशोक चक्रधर


भूख में होती है कितनी लाचारी,
ये दिखाने के लिए एक भिखारी,
लॉन की घास खाने लगा,
घर की मालकिन में
दया जगाने लगा।

दया सचमुच जागी
मालकिन आई भागी-भागी-
क्या करते हो भैया ?

भिखारी बोला
भूख लगी है मैया।
अपने आपको
मरने से बचा रहा हूं,
इसलिए घास ही चबा रहा हूं।

मालकिन ने आवाज़ में मिसरी घोली,
और ममतामयी स्वर में बोली—
कुछ भी हो भैया
ये घास मत खाओ,
मेरे साथ अंदर आओ।

दमदमाता ड्रॉइंग रूम
जगमगाती लाबी,
ऐशोआराम को सारे ठाठ नवाबी।
फलों से लदी हुई
खाने की मेज़,
और किचन से आई जब
महक बड़ी तेज,
तो भूख बजाने लगी
पेट में नगाड़े,
लेकिन मालकिन ले आई उसे
घर के पिछवाड़े।

भिखारी भौंचक्का-सा देखता रहा
मालकिन ने और ज़्यादा प्यार से कहा—
नर्म है, मुलायम है। कच्ची है
इसे खाओ भैया
बाहर की घास से
ये घास अच्छी है !

- अशोक चक्रधर

परदे हटा के देखो- अशोक चक्रधर


ये घर है दर्द का घर, परदे हटा के देखो,
ग़म हैं हंसी के अंदर, परदे हटा के देखो।

लहरों के झाग ही तो, परदे बने हुए हैं,
गहरा बहुत समंदर, परदे हटा के देखो।

चिड़ियों का चहचहाना, पत्तों का सरसराना,
सुनने की चीज़ हैं पर, परदे हटा के देखो।

नभ में उषा की रंगत, सूरज का मुस्कुराना
ये ख़ुशगवार मंज़र, परदे हटा के देखो।

अपराध और सियासत का इस भरी सभा में,
होता हुआ स्वयंवर, परदे हटा के देखो।

इस ओर है धुआं सा, उस ओर है कुहासा,
किरणों की डोर बनकर, परदे हटा के देखो।

ऐ चक्रधर ये माना, हैं ख़ामियां सभी में,
कुछ तो मिलेगा बेहतर, परदे हटा के देखो।

-अशोक चक्रधर