Friday, July 28, 2017

पतझड़ की पगलाई धूप

भोर भई जो आँखें मींचे,
तकिये को सिरहाने खींचे,
लोट गई इक बार पीठ पर
ले लम्बी जम्हाई धूप,
अनमन सी अलसाई धूप |

पोंछ रात का बिखरा काजल,
सूरज नीचे दबता आँचल,
खींच अलग हो दबे पैर से,
देह-चुनर सरकाई धूप,
यौवन ज्यों सुलगाई धूप |

फुदक-फुदक खेले आँगन भर
खाने-खाने एक पाँव पर,
पत्ती-पत्ती आँख-मिचौली
बचपन सी बौराई धूप,
पतझड़ की पगलाई धूप |

-मानोशी चटर्जी

यादें

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, 
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए!

- बशीर बद्र

वक़्त

पूरे होंगे अपने अरमाँ किस तरह, 
शौक़ बेहद वक़्त है कम क्या करें!

- दाग़ देहलवी

Thursday, July 13, 2017

बूढ़ा बचपन

भोले मुख पर छितरे बाल
 उजली आँखें, मैले गाल
झोली में दो पैसे डाल
चल देती वह लघु कंकाल
हाथ जोड़ कर विनती करती
अंधी माँ की विपदा कहती
फिर भी जनता कुछ न देती
कैसे जीवन नैया खेती ?
सोचे, सब कितने अनुदार तभी,
आया एक उदार दिए रूपये दस,
चल दी कार खुश हो बैठी –
किया विचार भूख लगी थी,
थी लाचार उठा लोभ का ऐसा ज्वार
सोचा, जी भर कर खा जाए
झुणका-भाखर और अचार
तभी आ गई माँ की याद
अंधी आँखें चढ़ता ताप
लेकर एक फूलों का हार
चढ़ा किया गणपति के द्वार
करना था माँ का उपचार
लिए हाथ में पेरू चार
सोच रही थी क्या दूँ,
माँ को जिससे फिर न चढ़े बुखार
बचपन उसका छूट गया था
दूर कहीं अम्बर के पार
माँ की चिन्ता घर की चिन्ता
और प्रतिदिन रोटी की चिन्ता
चिन्ताओं का ढेर अपार
नहीं था उनका पारावार
बुढ़ा गई थी उनमें फँस कर
वह नन्हीं बेबस लाचार !!