Tuesday, June 16, 2020

मकान- क़ैफ़ी आज़मी

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी।
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी।
 

ये ज़मीं तब भी निगल लेने पे आमादा थी 
पाँव जब टूटती शाखों से उतारे हमने।
इन मकानों को खबर है न मकीनों को खबर
उन दिनों की जो गुफाओं में गुजारे हमने।


हाथ ढलते गये सांचे में तो थकते कैसे
नक्श के बाद नये नक्श निखारे हमने।
की ये दीवार बलंद, और बलंद, और बलंद,
बाम-ओ-दर और जरा और सँवारे हमने।
 

आँधियाँ तोड़ लिया करती थी शम्‍ओं की लवें
जड़ दिये इसलिये बिजली के सितारे हमने।
बन गया कस्र तो पहरे पे कोई बैठ गया
सो रहे खाक पे हम शोरिश-ए-तामीर लिये।
 

अपनी नस-नस में लिये मेहनत-ए-पैहम की थकन
बंद आंखों में इसी कस्र की तस्‍वीर लिये।
दिन पिघलता है इसी तरह सरों पर अब तक
रात आंखों में खटकती है सियह तीर लिये।
 

आज की रात बहुत गरम हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी।
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी।


--क़ैफ़ी आज़मी 

प्रयाणगीत- जयशंकर प्रसाद

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती -
स्वयंप्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती -
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ हैं - बढ़े चलो बढ़े चलो।

असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी।
सपूत मातृभूमि के रुको न शूर साहसी।
अराति सैन्य सिंधु में - सुबाड़वाग्नि से जलो,
प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो बढ़े चलो।

- जयशंकर प्रसाद