Monday, September 28, 2020

लता मंगेशकर- आनंद बख्शी

 

ये गुलशन में बाद--सबा गा रही है

के पर्वत पे काली घटा गा रही है

ये झरनों ने पैदा किया है तरन्नुम

कि नदियां कोई गीत सा गा रही हैं

ये माहिवाल को याद करती हैसोहनी

कि मीरा भजन श्याम का गा रही हैं

मुझे जानें क्या क्या गुमां हो रहे हैं

नहीं और कोई लता गा रही हैं

यूं ही काश गाती रहें ये हमेशा

दुआ आज खुद ये दुआ गा रही है

 

ये कविता गीतकार आनंद बख्शी ने 1973 में लिखी थी लेकिन उन्होंने लता को ये कविता 2001 में भेंट की, जब लता मंगेशकर को पद्म विभूषण से नवाज़ा गया था।

Wednesday, September 23, 2020

नील कुसुम- रामधारी सिंह 'दिनकर'

‘‘है यहाँ तिमिर, आगे भी ऐसा ही तम है,
तुम नील कुसुम के लिए कहाँ तक जाओगे ?
जो गया, आज तक नहीं कभी वह लौट सका,
नादान मर्द ! क्यों अपनी जान गँवाओगे ?

प्रेमिका ! अरे, उन शोख़ बुतों का क्या कहना !
वे तो यों ही उन्माद जगाया करती हैं;
पुतली से लेतीं बाँध प्राण की डोर प्रथम,
पीछे चुम्बन पर क़ैद लगया करती हैं।

इनमें से किसने कहा, चाँद से कम लूँगी ?
पर, चाँद तोड़ कर कौन मही पर लाया है ?
किसके मन की कल्पना गोद में बैठ सकी ?
किसकी जहाज़ फिर देश लौट कर आया है ?’’

ओ नीतिकार ! तुम झूठ नहीं कहते होगे,
बेकार मगर, पागलों को ज्ञान सिखाना है;
मरने का होगा ख़ौफ़, मौत की छाती में
जिसको अपनी ज़िन्दगी ढूँढ़ने जाना है ?

औ’ सुना कहाँ तुमने कि ज़िन्दगी कहते हैं,
सपनों ने देखा जिसे, उसे पा जाने को ?
इच्छाओं की मूर्तियाँ घूमतीं जो मन में,
उनको उतार मिट्टी पर गले लगाने को ?

ज़िन्दगी, आह ! वह एक झलक रंगीनी की,
नंगी उँगली जिसको न कभी छू पाती है,
हम जभी हाँफते हुए चोटियों पर चढ़ते,
वह खोल पंख चोटियाँ छोड़ उड़ जाती है।

रंगीनी की वह एक झलक, जिसके पीछे
है मच हुई आपा-आपी मस्तानों में,
वह एक दीप जिसके पीछे है डूब रहीं
दीवानों की किश्तियाँ कठिन तूफ़ानों में।

डूबती हुई किश्तियाँ ! और यह किलकारी !
ओ नीतिकार ! क्या मौत इसी को कहते हैं ?
है यही ख़ौफ़, जिससे डरकर जीनेवाले
पानी से अपना पाँव समेटे रहते हैं ?

ज़िन्दगी गोद में उठा-उठा हलराती है
आशाओं की भीषिका झेलनेवालों को;
औ; बड़े शौक़ से मौत पिलाती है जीवन
अपनी छाती से लिपट खेलनेवालों को।

तुम लाशें गिनते रहे खोजनेवालों की,
लेकिन, उनकी असलियत नहीं पहचान सके;
मुरदों में केवल यही ज़िन्दगीवाले थे
जो फूल उतारे बिना लौट कर आ न सके।

हो जहाँ कहीं भी नील कुसुम की फुलवारी,
मैं एक फूल तो किसी तरह ले जाऊँगा,
जूडे में जब तक भेंट नहीं यह बाँध सकूँ,
किस तरह प्राण की मणि को गले लगाऊँगा ?

प्रतीक्षा- रामधारी सिंह 'दिनकर'

अयि संगिनी सुनसान की!

मन में मिलन की आस है,
दृग में दरस की प्यास है,
पर, ढूँढ़ता फिरता जिसे
उसका पता मिलता नहीं,
झूठे बनी धरती बड़ी,
झूठे बृहत आकश है;
मिलती नहीं जग में कहीं
प्रतिमा हृदय के गान की।
अयि संगिनी सुनसान की!

तुम जानती सब बात हो,
दिन हो कि आधी रात हो,
मैं जागता रहता कि कब
मंजीर की आहट मिले,
मेरे कमल-वन में उदय
किस काल पुण्य-प्रभात हो;
किस लग्न में हो जाय कब
जानें कृपा भगवान की।
अयि संगिनी सुनसान की!

मुख में हँसी, मन म्लान है,
उजड़े घरों में गान है,
जग ने सिखा रक्खा, गरल
पीकर सुधा-वर्षण करो,
मन में पचा ले आह जो
सब से वही बलवान है।
उर में पुरातन पीर, मुख
पर द्युति नई मुसकान की।
अयि संगिनी सुनसान की!

 

-रामधारी सिंह 'दिनकर'

Quote of the Day

Monday, September 21, 2020

Quote of the Day

जय बजरंगबली 🙏🚩

श्रितजनपरिपालं रामकार्यानुकूलं
धृतशुभगुणजालं यातुतन्त्वार्तिमूलम्।
स्मितमुखसुकपोलं पीतपाटीरचेलं
पतिनतिनुतिलोलं नौमि वातेशबालम्॥

#जय_श्रीराम #जय_बजरंगबली 🚩
#JaiShriRam #JaiBajrangbali 🚩 🙏

 

Quote of the Day

Tuesday, September 15, 2020

Quote of the Day

जय बजरंगबली 🚩🙏

मारुतिं वीरवज्राङ्गं भक्तरक्षणदीक्षितम्।
हनुमन्तं सदा वन्दे राममन्त्रप्रचारकम्॥

#जय_श्रीराम #जय_बजरंगबली 🚩
#JaiShriRam #JaiBajrangbali 🚩
🙏

Monday, September 7, 2020

जय बजरंगबली 🙏 🚩

बलिनामग्रगण्याय नमो नमः पाहि मारुते।
लाभदोऽसि त्वमेवाशु हनुमन् राक्षसान्तक।
यशो जयं च मे देहि शत्रून्नाशय नाशय॥

#जय_श्रीराम #जय_बजरंगबली 🚩
#JaiShriRam #JaiBajrangbali 🚩
🙏 

Sunday, September 6, 2020

Wednesday, September 2, 2020