Saturday, March 7, 2020

चांदनी चुपचाप सारी रात- अज्ञेय

चांदनी चुपचाप सारी रात-
सूने आँगन में
जाल रचती रही 

मेरी रूपहीन अभिलाषा
अधूरेपन की मद्धिम-
आंच पर तचती रही 

व्यथा मेरी अनकही
आनन्द की सम्भावना के
मनश्चित्रों से परचती रही 

मैं दम साधे रहा
मन में अलक्षित
आंधी मचती रही 

प्रात: बस इतना कि मेरी बात
सारी रात
उघड़ कर वासना का
रूप लेने से बचती रही 

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