कहु सजनी ! रजनी कहाँ ?अँधियारे में चूर;एक बरस में ढर गया,चेहरे पर से नूर;चेहरे पर से नूर;दूर दिल्ली दिखती है;नियति निगोड़ी कभीकथा उलटी लिखती है;कह कैदी कविराय,सूखती रजनीगन्धा;राजनीति का पड़ता है,जब उलटा फन्दा।
- - अटल बिहारी वाजपेयी
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