Monday, January 6, 2020

हथेली पर रखी है क्यों निगाहों में नहीं आती -डॉ० विनय मिश्र

हथेली पर रखी है क्यों निगाहों में नहीं आती
ये कैसी जिंदगी है जो खयालों में नहीं आती


मुझे ही काटकर बहती है इक ऐसी नदी मुझमें
किनारों में भी रहकर जो किनारों तक नहीं आती

ज़माना मान लेता मैं भी मुजरिम हूँ जमाने का
तेरी साज़िश समय पर जो उजालों में नहीं आती

निरंतर ज़हर देने की यहाँ कोशिश तो होती है
खुदा का शुक्र है दुनियां छलावों में नहीं आती

इधर कुछ लोग सोते हैं बिछा फुटपाथ की चादर
उधर बेचैनियाँ हैं नीद रातों में नहीं आती

सवालों के इलाके में मैं अक्सर घूम आता हूँ
मगर हालत सवालों की जवाबों में नहीं आती

सुनाने बैठ जाऊं तो बहुत दिलचस्प है लेकिन
हकीकत लाख कोशिश पर भी बातों में नहीं आती

-
डॉ० विनय मिश्र

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